तस्वीर, जो व्यवस्था पर करती है सवाल।
जब भी आग लगने की घटना होती है, उसके बाद बैठकें होती हैं, सुरक्षा पर गहन चर्चा होती है और अंत में आश्वासन दिया जाता है, “भविष्य में ऐसी घटना न हो, इसके लिए ठोस कदम उठाए जाएंगे।”
पिछले दिनों कांटाटोली बस स्टैंड में लगी आग के बाद भी यही क्रम दोहराया गया, चर्चा, बैठकें, जांच की बातें… और फिर सब सामान्य।
यह तस्वीर सदर अस्पताल, राँची की है।
ज़मीन पर जो टूटा, गिरा और लाचार पड़ा दिखाई दे रहा है, वह शायद फायर हाइड्रेंट है।
अब ज़रा सोचिए…
भगवान न करे, लेकिन यदि किसी आपात स्थिति में इसकी आवश्यकता पड़ जाए, तो यह कैसे काम करेगा?
तो क्या दुर्घटना के बाद केवल बैठक, चर्चा, जांच और आश्वासन ही समाधान हैं , या फिर समय रहते व्यवस्था को दुरुस्त करना ज़्यादा आवश्यक है?

