जब अधिकांश लोग सुबह की नींद में होते हैं, तब इटकी के कुंदी मैदान में कुछ बच्चों के सपनों को नई उड़ान दी जा रही होती है। यह कहानी है दो ऐसे लोगों की, जिन्होंने बिना किसी प्रचार, बिना किसी सरकारी मदद और बिना किसी स्वार्थ के गांव के बच्चों की जिंदगी बदलने का संकल्प लिया।
नशे और मोबाइल की लत से छुटकारा पाने के लिए लोग कई तरह के प्रयास करते हैं। कोई सफल होता है तो कोई असफल। ऐसी ही एक प्रेरणादायक कहानी इटकी के रहने वाले डब्बू केरकेट्टा और विकास उरांव की है, जिन्होंने अपने प्रयासों से गांव के युवाओं की जिंदगी बदलने का बीड़ा उठाया।
डब्बू केरकेट्टा पुलिस मुख्यालय, राँची में कार्यरत हैं। जब उन्होंने अपने गाँव के बच्चों को नशे और मोबाइल की लत की ओर बढ़ते देखा, तो उन्होंने हर सुबह बच्चों को मैदान में एकत्र कर व्यायाम कराना शुरू किया। उनका उद्देश्य केवल बच्चों को इन बुरी आदतों से दूर करना नहीं था, बल्कि उन्हें यह भी समझाना था कि स्वस्थ शरीर ही स्वस्थ भविष्य की सबसे बड़ी नींव है।
इस अभियान में बाद में उनके साथ विकास उरांव भी जुड़ गए, जो पेशे से अखबार वितरक (हॉकर) हैं। अखबार वितरक होने के कारण उनकी सुबह तब शुरू हो जाती है, जब अधिकांश लोग गहरी नींद में होते हैं। रोज सुबह चार बजे उठकर वह सबसे पहले समय पर लोगों के घरों तक अखबार पहुंचाते हैं और अपनी जिम्मेदारी पूरी करने के बाद सीधे कुंदी मैदान पहुंचकर डब्बू केरकेट्टा के साथ बच्चों को व्यायाम कराते हैं तथा फुटबॉल का प्रशिक्षण भी देते हैं।
डब्बू और विकास की निस्वार्थ सेवा तथा समर्पण ने गांव के बच्चों और युवाओं को प्रेरित किया। धीरे-धीरे बच्चों को भी व्यायाम, अनुशासन और स्वस्थ जीवनशैली का महत्व समझ आने लगा। देखते ही देखते बड़ी संख्या में बच्चे इस पहल से जुड़ते चले गए। वर्ष 2025 में दोनों ने एक एकेडमी की शुरुआत की, जिसका नाम गांव के बच्चों ने अपने गुरुजनों के सम्मान में ‘डब्बू विकास एकेडमी’ रखा।
इस एकेडमी में बच्चों को व्यायाम, फुटबॉल, लंबी कूद, ऊंची कूद, दौड़ समेत विभिन्न खेलों का प्रशिक्षण दिया जाता है। सबसे खास बात यह है कि यह प्रशिक्षण पूरी तरह निःशुल्क है। वर्तमान में यहां करीब 100 बच्चे प्रशिक्षण ले रहे हैं। इसी एकेडमी से प्रशिक्षण प्राप्त सात युवाओं का चयन होमगार्ड में हुआ है।
यह केवल सात युवाओं के चयन की कहानी नहीं, बल्कि इस बात का प्रमाण है कि सही मार्गदर्शन, अनुशासन और निरंतर मेहनत किसी भी युवा के जीवन की दिशा बदल सकती है। कभी जिन बच्चों के गलत राह पर भटकने की आशंका थी, आज वही युवा सरकारी सेवा में चयनित होकर न केवल अपने परिवार, बल्कि पूरे गांव का नाम रोशन कर रहे हैं। कल्पना कीजिए, यदि उन्हें डब्बू केरकेट्टा और विकास उरांव जैसे मार्गदर्शक नहीं मिले होते, तो शायद उनकी जिंदगी की दिशा कुछ और होती।
डब्बू केरकेट्टा और विकास उरांव ने आज के उस दौर में एक अलग उदाहरण पेश किया है, जहां अक्सर समाजसेवा भी सोशल मीडिया पर प्रचार का माध्यम बन जाती है। उन्होंने कभी अपने कार्य का प्रचार या दिखावा नहीं किया। बिना किसी शोर-शराबे के, पूरी निष्ठा और समर्पण के साथ वे वर्षों से गांव के बच्चों का भविष्य संवारने में लगे हैं।
डब्बू केरकेट्टा बताते हैं कि वह वर्ष 1990 से प्रतिदिन मैदान पहुंचकर स्वयं व्यायाम करते हैं और लोगों को व्यायाम व खेलकूद के प्रति जागरूक करते आ रहे हैं। उन्होंने बताया कि सीमित संसाधनों और अपने निजी खर्च से वह एकेडमी का संचालन कर रहे हैं। उनके प्रशिक्षण से अब तक गांव के करीब 30 युवाओं का चयन झारखंड पुलिस, भारतीय सेना, सीआरपीएफ और अग्निवीर में हो चुका है।
हालांकि, इतने वर्षों से समाजहित में कार्य करने के बावजूद उन्हें अब तक किसी स्थानीय जनप्रतिनिधि, विधायक या सांसद से कोई सहयोग नहीं मिल सका है। फिर भी उन्हें पूर्ण विश्वास है कि भविष्य में समाज और जनप्रतिनिधियों का सहयोग मिलेगा, जिससे एकेडमी को और बेहतर बनाया जा सकेगा तथा गाँव के बच्चों को निःशुल्क प्रशिक्षण देने का यह अभियान अनवरत चलता रहेगा।
यह कहानी सिर्फ डब्बू केरकेट्टा और विकास उरांव की नहीं, बल्कि इस बात का जीवंत उदाहरण है कि अगर एक व्यक्ति समाज बदलने की ठान ले, तो सीमित संसाधन भी बड़े बदलाव की राह बन सकते हैं।

